गुरुवार, 1 सितंबर 2011


फिर बदरा के पंख मचलने वाले हैं
इन्द्रधनुष के पाँवों चलने वाले हैं

ताल तलैए प्यासे काग़ज़ की नावों के
बौछारों में बच्चे हैं मतवाले हैं

सोंधी मिट्टी की खुशबू पुरुवाई में
बस्ती वाले मूड बदलने वाले हैं

पिछले मौसम अगले मौसम सब भीगे से
बात छिड़ी है उफने नद्दी नाले हैं

पनघट वाले जमघट यूँ तो उड़न छू हुए
घिर घिर बरसे याद चाय के प्याले हैं

2 टिप्‍पणियां: