तब दबे पाँव सपने
आये बनने अपने
यूँ बात चल रही थी
पदचिन्ह अभी तक हैं
ये भिन्न अभी तक हैं
परछाईं थी सुबहा की
जो रात छल रही थी
मर मिटे तभी जागे
भय के धागे भागे
राहें आगे आगे
खुल गईं बिना माँगे
थी उजली हर मंज़िल
दुख बादल थे छँटने
फिर होंठ लगे कँपने
हसरतें पल रही थीं
बेरंग कल पड़े थे
वो आज लगे हँसने
फिर बीच शहर धँसने
कुछ लोग चल पड़े थे
बेअदब हवायें थीं
बेअसर दुआयें थीं
मझधार में पड़ी कश्ती
फिर भी निकल रही थी
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें