मंगलवार, 6 सितंबर 2011


जब रात ढल रही थी
तब दबे पाँव सपने 
आये बनने अपने 
यूँ बात चल रही थी
 
पदचिन्ह अभी तक हैं 
ये भिन्न अभी तक हैं
परछाईं थी सुबहा की 
जो रात छल रही थी
 
मर मिटे तभी जागे 
भय के धागे भागे 
राहें आगे आगे 
खुल गईं बिना माँगे

थी उजली हर मंज़िल
दुख बादल थे छँटने 
फिर होंठ लगे कँपने 
हसरतें पल रही थीं
 
बेरंग कल पड़े थे 
वो आज लगे हँसने 
फिर बीच शहर धँसने 
कुछ लोग चल पड़े थे
 
बेअदब हवायें थीं 
बेअसर दुआयें थीं 
मझधार में पड़ी कश्ती 
फिर भी निकल रही थी



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