मंगलवार, 6 सितंबर 2011

उनकी गली नहीं अब तो चौरस्ता है उस ठाँव
उनके बिन बेरंग मुंडेरें, सस्ता है वो गाँव

ईंटों वाली दीवारों में नाम खुदे थे धुँधले से
चढ़े पलस्तर दफ़न मोहब्बत लौटा उल्टे पाँव

साक्षी थे गुमनाम मिलन के आहिस्ते से मिटे निशाँ
वन विभाग ही काट ले गया रस्तों वाली छाँव

नई पौध है इनके लिए कहानी जैसी सारी बातें
आयेगा वो कह हँसते जब कागा बोले काँव

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें