मंगलवार, 6 सितंबर 2011

रस्ते में आया तो नीम कट गया 
आँगन पड़ा साबुत पर घर बँट गया

बड़े बड़े कमरे हैं दिल हैं छोटे 
लोकलाज परदा था अभी हट गया

प्यार की दुकान में सब डिब्बाबंद 
नमक था जबान का ज़रा उलट गया

दुश्मन है रटने में सदियाँ गुज़रीं 
वार करे मौका है क्यूँ सट गया

समझा था ठहरेंगी परिभाषायें 
जगहें बदलीं तो कोहरा छँट गया

2 टिप्‍पणियां:

  1. Bant gaya sansaar , toot gaya parivar , beechhar gaya pyaar , kya yehi hai sahi vichar !!!

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  2. बँटवारे की शक्लें इतनी अमूर्त रूप में समाज में हैं जिन्हें पकड़ पाना मुश्किल होता है... इस ग़ज़ल में दिखावा और यथार्थ के बीच फ़ासले को पकड़ने की कोशिश है...अवसरवादी सम्बंध सवालों के घेरे में खड़े मिलते हैं...परिभाषायें अब वही नहीं हैं जैसा हम पढ़ते आये हैं...शब्द अपना अर्थ खो रहे हैं और सम्बंध अपनी पहचान... अनकहे को कहने की कोशिश भर है ये बातें... पर उतना कह नहीं पाया जितना महसूस हो रहा है आजकल... ...

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