रविवार, 19 सितंबर 2010


फोन कॉल के इन्तज़ार में कब से होंगे वो यहाँ नेटवर्क नहीं है...
सोच रहे होंगे मैं उनको भूल गया उनके बिन मुझको फ़र्क नहीं है...

गुस्से से बरतन हार्मनी सुनाते होंगे जब तब फिर सन्नाटे चुभते होंगे...
तड़प की मीटर रीडिंग कैसे कर पायेंगे सोचते रहे हर्फ़ नहीं है...

शक,डर,आशंका के बादल घिरते होंगे मन में चेहरे बनते - मिटते होंगे...
लाख यकीन दिलायें उनको प्यार में इन्सिक्योर हुए तो तर्क नहीं है...

मिले तो सीना छलनी करने वाले घूसे दिये जा रहे आँखे बरस गईं...
बहुत देर तक देह लिपट कर बात बोलती रही इश्क है, बर्फ़ नहीं है...

सच ही तो बोला था उनसे ऐसे किये रियेक्ट कि जैसे का़तिल हूँ मैं उनका...
मार दिया नज़रों से उनकी ट्रांसपेरेन्सी भायी उसमें लेशमात्र भी पर्त नहीं है...

1 टिप्पणी:

  1. मिले तो सीना छलनी करने वाले घूसे दिये जा रहे आँखे बरस गईं...
    बहुत देर तक देह लिपट कर बात बोलती रही इश्क है, बर्फ़ नहीं है...

    अच्छी पंक्तिया ........

    इसे भी पढ़कर कुछ कहे :-
    आपने भी कभी तो जीवन में बनाये होंगे नियम ??

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