फिर शाम हुई मिट्टी के चूल्हे जले
पतीला चाय का चढ़ा
मद्धम-मद्धम आँच हुई जब उठे धुँआ सोंधा -सोंधा
फिर लपटें लगीं गले...
खटिये के पैताने बैठी रही भले
सहमता हाथ ना बढ़ा
गुमसुम इज़हारों का मौसम चाय उफनकर जैसे फैला
बोली वो तभी चलें?
लगा कि जैसे बत्ती गुल हो गई
अचानक देखता खड़ा
उसने खोली गाँठ ओढ़नी के कोने में चाकलेट था
स्वाद वो अब तक छले...
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