रविवार, 19 सितंबर 2010


उसको जीने की अदम्य इच्छा कहते हैं
जो डरे बिना तूफ़ां को डँटकर सहते हैं

ये सूरज-चाँद उन्हीं में सिमटे जाते हैं
हर जोड़-घटाना से ऊपर वो रहते हैं

सौ-सौ बार उजड़कर बसना उनसे सीखो
सब बिखरे हुए गणित के पेज़ सिमटते हैं

हैं उम्मीदों के गीत से उड़ीं उनकी नींदे
वो खौ़फ़ज़दा हैं बिना ढहाये ढहते हैं...

1 टिप्पणी:

  1. सौ-सौ बार उजड़कर बसना उनसे सीखो
    सब बिखरे हुए गणित के पेज़ सिमटते हैं

    अच्छी पंक्तिया ........

    इसे भी पढ़कर कुछ कहे :-
    आपने भी कभी तो जीवन में बनाये होंगे नियम ??

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