रविवार, 19 सितंबर 2010


बारिश की चादर ओढ़े ये अपार्टमेन्ट हैं
गीली सड़कें काँप रही हैं नो कमेन्ट हैं

ऑटो रिक्शा खाली दौड़े भागे जाते
दूर शहर के बाहर उनके कहीं टेन्ट हैं

भूखे लोग हज़ारों अब भी शहर में धँसे
बेघर उम्मीदों के चेहरे पुते पेन्ट हैं

फुटपाथों पे बुल्डोज़र आये मँडराये
घर होना बेहद मुश्किल है बहुत रेन्ट है

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें