रविवार, 19 सितंबर 2010


छुईमुई सी आँगन में वो
खड़ी-खड़ी कुछ बातें अनगढ़
कहकर खिलखिल हँसकर आँखें
मटकाकर घर चली गई थी...

गये हुये तो पहर हो गये
सन्नाटे आने थे लेकिन
गूँज बची थी पत्ते-पत्ते
में हरियाली नई नई थी...

थोड़ी सी थी तड़प ज़रा सी
शरम बसी थी देह गंध में
हाले दिल अनजाने में कह
दिये पुरानी बात कई थी...

धड़का था दिल अब तक उसकी
ही यादें हैं झिलमिल झिलमिल
रात बीतने लगी सुहानी
लेकिन वही निर्दयी थी...

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