मीठी है बोली वो ज़ालिम है परख ज़रा
दबे पाँव आये जो मिलने वो नहीं खरा
आँखों में छुपे ज्वार-भाटे हैं भाँपना
बदले की आग दबी होठों का काँपना
चाह रहा देखना वो सबको ही डरा डरा
टूटे उम्मीद नहीं अभी नहीं आँकना
छोड़ उन्हें बढ़े चलो फुरसत से जाँचना
आगे ही मंज़र है खुशगवार हरा-भरा
हँसने दो सपनों पे देने दो यातना
अच्छा है मुश्किल को मेहनत से काटना
हिम्मत से जिये वही मर के भी नहीं मरा
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