रविवार, 19 सितंबर 2010


कहीं है हैसियत का बोलबाला...
कहीं छिनता गरीबों का निवाला...

दुवारे पर खड़ा है लोन पे ट्रैक्टर ...
उसी के ब्याज़ में निकला दिवाला...

अपढ़, मासूम थे पगडंडियों वाले...
दिखा पक्की सड़क का पाठशाला...

बहुत बेआबरू इंसानियत होती रही...
सफल अक्सर बुरे बनकर हवाला...

धुँधलके हट गये चश्मा हटा तो...
नज़र बदली तो देखा है उजाला...

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