शनिवार, 8 मई 2010


सब गये इतवार बिन छुट्टी...
कर गये हैं यार अब कुट्टी...

ज़िंदगी से पल गये अनगिन...
छ्ल रही है हैसियत घुट्टी...

हो रहे हैं लोग जब नीरस...
क्या बनेंगी उँगलियाँ मुट्ठी...

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