शनिवार, 8 मई 2010



आहट थी जो शोर बन गई ...
समझौतों से जंग ठन गई...

अपने थे पर गिरे मुखौटे...
चिन्ताओं से झूठ छन गई...

सच्चे रिश्तों की तलाश है...
बेज़ुबान पहचान तन गई... 



गीली माटी पाँव चले हैं... 
मंज़िल अपनी छाप सन गई...

2 टिप्‍पणियां:

  1. हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
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  2. चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है। सार्थक एवं सफल ब्लॉगिंग के लिए शुभकामनाएं...
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