बेड़ियाँ टूटीं चिरागों ने जलाये गाँठ सारे...
दूब तो यूँ ही खड़ी थी थक गये तूफ़ान हारे...
ओंस की बूँदें अछूती ही रहीं अभिमान से...
सुबह जब चमकीं शरम से सो गये सारे सितारे...
लंगरों की साजिशें बाँधे किनारे कश्तियों को...
पार जाना है अगर तो चल ज़रा अब बीच धारे...
बाँह फ़ैलाये खड़े उस पार उजले ख्वाब सारे...
संग उनके चल पड़ेंगे कामयाबी है पुकारे...
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