सामाजिक अंतर्संबंधों से गुज़रते हुए भावों के इन्द्रधनुषी संसार को थामने की कोशिश करती छुवन की रचनाएँ जीवन की सघन अनुभूतियों की अनुगूँज हैं... एक ऐसा संसार जहाँ कहने से ज़्यादा अनकहे को आकार देने की तड़प है... ये रचनाएँ रोज़मर्रा की ज़िंदगी की उठापटक से मन की सलेट पे बने आड़े टेढ़े चिन्हों को पढ़ने की कोशिश है...आइए चलते हैं शब्द और स्मृतिचित्र के सहारे अनुभूतियों के अन्तर्जगत में...
सोमवार, 24 मई 2010
बाहर इतनी गर्मी है... बादल की बेशर्मी है...
टूटे घड़े पड़े सूखे हैं... हवा नहीं बेरहमी है...
जीवन जहाँ शुरू होता है... कड़वी धूप गुज़रनी है...
मेहनतकश की सारी जगहें... बिन ए.सी. बिन नरमी है...
लू के दिन तो बीत ही चले... जीते नहीं अधर्मी हैं...
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