मातमपुरसी में आये फिर भी उनको आतिथ्य चाहिए...
आदमीयत सीख न पाये सिखा रहे हैं शिष्य चाहिए...
वर्तमान पे कालिख पोते लानत हैं संवेदनहीन...
उजड़ी हुई बस्तियों में भी सुन्दर उन्हें भविष्य चाहिए...
कहना-सुनना क्या समझाना इतने तो नादान नहीं हैं...
आँसू से लबरेज़ हैं कला है, रोयेंगे, दृश्य चाहिए...
भलमनसाहत वेश्या जैसी अब तो उनकी नज़रों में है...
नोंच अँधेरे छुपके भागे दिन चढ़ते अश्पृश्य चाहिए...
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