सोमवार, 24 मई 2010


खिड़की से वो हवा चली आती थी यूँ सिरहाने...
रोज़ मुहल्ले में किस्से बन जाते थे अनजाने...

ज़रा - ज़रा सी बातें खुशबू बनके महके मन के आँगन...
हथेलियाँ छपतीं गालों पे माथे छूतीं आँखें चंदन...

टेढ़े-मेढ़े अक्षर होंगे प्रेमपत्र क्यूँ माने...
अनपढ़ दिल है इश्क हुआ आँखों की भाषा जाने...

खिड़की से वो हवा चली आती थी यूँ सिरहाने...
रोज़ मुहल्ले में किस्से बन जाते थे अनजाने...

पायल की आवाज़ गली में बोले साजन- साजन...
तारे चुगली करें पड़ोसी जागे सारे बाभन...

सारे मन्त्र शाप में बदले कोप लगे बरसाने...
प्रेम के पंथ कराल महा है किस्से वही पुराने...

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