सोमवार, 24 मई 2010


आड़ी-तिरछी कई किताबें,पोस्टकार्ड, कुछ बंद लिफ़ाफ़े
टेबल पर होते थे...
कुहनी ही सिरहाने रखकर बिन बिस्तर ,बिन तकिए सपने
याद बिछाकर सोते थे...


टेबल लैम्प घूर कर देखे दरवाज़े की साँकल को...
कलम फ़ँसी डायरी बीच अब कोस रही बीते कल को...


गरम चाय का प्याला रोया शाम हो गई रात रो गई लौटॆ ना वो
जो बाहों में खोते थे..

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