सोमवार, 24 मई 2010

लू चला सारा दिन आम के बगीचे में
तोते जो कुतरे थे आम बड़े खट्टे थे...
प्यास थी सुराही में सूख रही उनके बिन
आते तो शान में लगने जो बट्टे थे...

सूरज की आँच में काँपती दिशाएँ थीं...
गायब थे बच्चों को कोस रही माँएँ थीं...
बचपन की दोस्ती इतनी आशाएँ थीं...
ताप भरी दुपहर से मिलनी दुआएँ थीं...

आई वो नीली थी ओढ़नी के कोर से
बँधे हुए नमक-मिर्च और तिलपट्टे थे...
गुस्से के संग-संग सैकड़ों उलाहने,
अनगिन चिन्ताएँ उसमें इकट्ठे थे...

लू चला सारा दिन आम के बगीचे में
तोते जो कुतरे थे आम बड़े खट्टे थे...
प्यास थी सुराही में सूख रही उनके बिन
आते तो शान में लगने जो बट्टे थे...

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