मीठे गुड़ की खुशबू लिपटी सारी शामें...
भुने चने पर नमक मिर्च सी बाँहें थामें...
चले जा रहे पगडंडी पर अपनी धुन में...
छुपेंगे नहीं इश्क नहाये कारनामें...
धोखे से वो मिलन की करे तैयारी है ...
प्यार कहूँ या आना उसकी ऐय्यारी है...
शुरू रतजगे तारे गिनना अब जारी है...
बन्द पलक में वो है उसपे जग वारी है...
फिर आये हैं लुकाछिपी के वो अफ़साने...
नज़र पढ़ गये काम न आये लाख बहाने...
तड़प कबूतर चुन लाये चाहत के दाने...
मन में रहे बसेरा उनके बस ये ठाने...
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