सामाजिक अंतर्संबंधों से गुज़रते हुए भावों के इन्द्रधनुषी संसार को थामने की कोशिश करती छुवन की रचनाएँ जीवन की सघन अनुभूतियों की अनुगूँज हैं... एक ऐसा संसार जहाँ कहने से ज़्यादा अनकहे को आकार देने की तड़प है... ये रचनाएँ रोज़मर्रा की ज़िंदगी की उठापटक से मन की सलेट पे बने आड़े टेढ़े चिन्हों को पढ़ने की कोशिश है...आइए चलते हैं शब्द और स्मृतिचित्र के सहारे अनुभूतियों के अन्तर्जगत में...
शनिवार, 8 मई 2010
पड़ गया है छाँव पर डाका... फिर किसी ने पेड़ है काटा...
दुधमुहों के पंख हैं छितरे ... टहनियों ने दुख नहीं बाँटा...
टूटकर अंडॆ गिरे चारों तरफ़ ... घोंसले केवल हुए काँटा...
राहगीरों दूर तक रुकना नहीं... सह ज़रा ईमान का घाटा...
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