शनिवार, 8 मई 2010


आँछी और शिरीष घने थे...बेरी, गूलर मीत बने थे...
टेढ़ी पगडंडी से होकर गीत उठ रहे प्रीत सने थे...

नदिया में परछाँई पड़ती...
बँधी नाव, रेती में गड़ती...
घाट पाट सब चश्मदीद थे...
देह डूबती देह उमड़ती...

बंधन वाले दिन थे गाँव-जवार न अपने थे...
थोड़ा इश्क हकीकत जैसे थोड़े सपने थे...

छूटा- टूटा सबकुछ वो पल छाप अमिट बन छपने थे
...

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