गुरुवार, 7 मई 2015



जल रही है याद की तीली
मौन आँखें हो रहीं गीली

छुवन का वो पेड़ है ठिठुरा
तड़प में हैं पत्तियाँ पीली


शोर वाले घोंसले भी मौन हैं
छल रही है रात रंगीली

दिल जले मीनार सा दुख तन गया
उठ रही है आह इक सीली

आ ज़रा कह हाल बैरन हमनवा
रोकने की पहल जब ढीली

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