गुरुवार, 7 मई 2015



समन्दर रोया मगर लहरों पे हलचल थी हँसी के छींटे थे
दिशायें चुप थीं ढलती सी शाम के रंग ज़रा फ़ीके थे

पटरियों ने गले लगाना न छोड़ा सर्द रात की ट्रेनें थीं
शोर की लयबद्ध लहरी उठ रही थी गीत के बोल मीठे थे


सोया सा शहर था वीरान सी गलियाँ और पेड़ अलसाये से
फूलों की शोख खुशबू दौड़ रही थी कोहरे में रंग कहीं रूठे थे

नावों के पाँव निकल पड़े चुपके से चप्पू ने हाँक लगाई
सफ़र में मंज़िलों के निशां टिमटिमटिम बत्तियों सरीखे थे

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