सोमवार, 24 नवंबर 2014



गाँव तक पक्की सड़क अब आ गई है...
मदद की सारी रवायत खा गई है...

साइकिलों पे डबल जाना गुम हुआ अब...
सवारी भाड़ा कमाई भा गई है...

साँकलों के दिन लदे ताले बढ़े हैं...
आँगनों में गर्द मोटी छा गई है...

महानगरों में कमासुत नई पीढ़ी...
फ़ोन पे ही हाल सब सुनवा गई है...

झोंपड़े पक्के हुए बुझता अलाव...
पड़ोसी से दूरियाँ तड़पा गई हैं...

1 टिप्पणी:

  1. बहुतों की स्मृतियों को ताज़ी करती हुई और आज की बदली स्थितियों को बयाँ करती ...बेहतरीन कविता ........

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