वो बसंत की सुबहें तो सुनसान रहा करती थीं
चंद काम थे दिनचर्या आसान रहा करती थी
आज सभी आवाज़ें दब कर गुम टीवी के शोर में...
बच्चों भूले जो हरकत नादान रहा करती थी...
कहानियों की बातें छोड़ो दादी को भूले मुहावरे...
वही आदतें भाईं जो बदनाम रहा करती थी...
उनको भी है बहुत शिकायत आज हमारी पीढ़ी से...
चलते रहे मगर राहें अनजान रहा करती थीं...
कटे जड़ों से या जड़ काटे वो ही जानें सच क्या है...
ओझल है अपनापन जो दिल थाम रहा करती थी...
चंद काम थे दिनचर्या आसान रहा करती थी
आज सभी आवाज़ें दब कर गुम टीवी के शोर में...
बच्चों भूले जो हरकत नादान रहा करती थी...
कहानियों की बातें छोड़ो दादी को भूले मुहावरे...
वही आदतें भाईं जो बदनाम रहा करती थी...
उनको भी है बहुत शिकायत आज हमारी पीढ़ी से...
चलते रहे मगर राहें अनजान रहा करती थीं...
कटे जड़ों से या जड़ काटे वो ही जानें सच क्या है...
ओझल है अपनापन जो दिल थाम रहा करती थी...
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