हज़ारों आह भी जब साथ हों उम्मीद जगती है...
सितारे बन गये जुगनू वहीं बारात लगती है...
सुना है पत्थरों के कान तो होते नहीं फिर भी...
रियाया संगठित हो तो सियासत खूब डरती है...
बसे घर को उजाड़ें खुद कहीं शोभा नहीं देता...
जगी है भूख जुड़वे ख्वाब की माँ भेद करती है...
चलो चलते हैं अब दैरो-हरम से दूर लहरों तक...
लगें नमकीन चाहत के गले जो ज़ख़्म भरती है...
हमारी धड़कने उड़ायेंगी किसी की नींद कब सोचा...
मगर इतिहास के पन्नों पे सदी की छाप पड़ती है...
सितारे बन गये जुगनू वहीं बारात लगती है...
सुना है पत्थरों के कान तो होते नहीं फिर भी...
रियाया संगठित हो तो सियासत खूब डरती है...
बसे घर को उजाड़ें खुद कहीं शोभा नहीं देता...
जगी है भूख जुड़वे ख्वाब की माँ भेद करती है...
चलो चलते हैं अब दैरो-हरम से दूर लहरों तक...
लगें नमकीन चाहत के गले जो ज़ख़्म भरती है...
हमारी धड़कने उड़ायेंगी किसी की नींद कब सोचा...
मगर इतिहास के पन्नों पे सदी की छाप पड़ती है...
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