सामाजिक अंतर्संबंधों से गुज़रते हुए भावों के इन्द्रधनुषी संसार को थामने की कोशिश करती छुवन की रचनाएँ जीवन की सघन अनुभूतियों की अनुगूँज हैं... एक ऐसा संसार जहाँ कहने से ज़्यादा अनकहे को आकार देने की तड़प है... ये रचनाएँ रोज़मर्रा की ज़िंदगी की उठापटक से मन की सलेट पे बने आड़े टेढ़े चिन्हों को पढ़ने की कोशिश है...आइए चलते हैं शब्द और स्मृतिचित्र के सहारे अनुभूतियों के अन्तर्जगत में...
सोमवार, 21 जून 2010
बीत गये शिकवे के दिन सारे सूख गया अपनापन क्यूँ प्यारे
झूठे थे इन्तज़ार के लमहे गिनती से कम ही थे अब तारे
नाम पता याद रहा घर खोया ढूँढ़ रहे अपनों को तो हारे
चलें ज़रा राहें तो गैर नहीं यहाँ नहीं मंज़िल के बँटवारे
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