घर से निकले
रेनकोट के बिना
सुबह की धूप देखकर
हँसने लगे बगीचे
तो सोचा कुछ घपला है...
चोरी हुई हवायें
पुरुवा,
पछुआ चली अचानक
बादल घेरघार कर आये
बरसे
तब जाना उसने छला है...
अच्छा लगा भीगना
छाते पड़े-पड़े दुकान में
शर्माए ऐसे जैसे
खुली आँख में चुपके-चुपके
बेशकीमती ख्वाब पला है...
छींटे पड़े वहाँ तक
कोई कोना मन का
हरा हो गया
तलब लगी तो जाना
अंगीठी पे चाय उबलना भला है...
ज़रा-ज़रा सी बात
की तरह भीगे बदन गैर फ़र्श से
डाँट-डपट के रस्ते उन नैनों की बालकनी
में जा धमके तो जाना प्यार कला है...
रेनकोट के बिना
सुबह की धूप देखकर
हँसने लगे बगीचे
तो सोचा कुछ घपला है...
चोरी हुई हवायें
पुरुवा,
पछुआ चली अचानक
बादल घेरघार कर आये
बरसे
तब जाना उसने छला है...
अच्छा लगा भीगना
छाते पड़े-पड़े दुकान में
शर्माए ऐसे जैसे
खुली आँख में चुपके-चुपके
बेशकीमती ख्वाब पला है...
छींटे पड़े वहाँ तक
कोई कोना मन का
हरा हो गया
तलब लगी तो जाना
अंगीठी पे चाय उबलना भला है...
ज़रा-ज़रा सी बात
की तरह भीगे बदन गैर फ़र्श से
डाँट-डपट के रस्ते उन नैनों की बालकनी
में जा धमके तो जाना प्यार कला है...
बहुत उम्दा, योगेश! बधाई अच्छे लेखन के लिए.
जवाब देंहटाएंdhanyavaad ji...
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