सोमवार, 21 जून 2010

घर से निकले
रेनकोट के बिना
सुबह की धूप देखकर
हँसने लगे बगीचे
तो सोचा कुछ घपला है...

चोरी हुई हवायें
पुरुवा,
पछुआ चली अचानक
बादल घेरघार कर आये
बरसे
तब जाना उसने छला है...

अच्छा लगा भीगना
छाते पड़े-पड़े दुकान में
शर्माए ऐसे जैसे
खुली आँख में चुपके-चुपके
बेशकीमती ख्वाब पला है...

छींटे पड़े वहाँ तक
कोई कोना मन का
हरा हो गया
तलब लगी तो जाना
अंगीठी पे चाय उबलना भला है...

ज़रा-ज़रा सी बात
की तरह भीगे बदन गैर फ़र्श से
डाँट-डपट के रस्ते उन नैनों की बालकनी
में जा धमके तो जाना प्यार कला है...

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