शुक्रवार, 4 जून 2010


बेतहाशा भागती गाड़ियों जैसी ज़िंदगी की सड़क पे साँसें...
बीतती हैं,हर घड़ी उम्मीद वाली सह रही है प्यार से झाँसे...

स्वार्थ के अनगिनत सिग्नल भीड़ वाले लाल सबको मुँह चिढ़ाते...
धूल में लिपटे धुयें में गुम हुए बोझिल निकटता के दिलासे...

सच किसी सीटी सरीखा दबा है सोये पुलिस के होंठ में जाके...
वक्त से आगे चले तो काट कर चालान रोके झूठ फिर फाँसे...

1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुन्दर योगेश भैया. क्या जाल बुनते हैं शब्दों का आप. बहुत सुन्दर!!!!!!!!!!

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