सोमवार, 24 नवंबर 2014

राजधानियों की कहानियों में रहती है प्रजा कहाँ...
बहुत बुलाया दिल्ली ने पर गये नहीं वो मज़ा कहाँ...

सुनते हैं अपराध बहुत है डरे हुए हैं सारे लोग...
खुलेआम घोटाले वाले घूम रहे हैं सज़ा कहाँ...


गद्दी की माराकाटी है मरे पचास चली गोली...
भीड़ मरी है उन्हें खबर में आने की है अदा कहाँ...

जिन्हें मोहब्बत से रहना है उन्हें ही यहाँ खतरा है...
रखे तमंचा दिखे हेंकड़ी उसके संग है दगा़ कहाँ...

रोज़ी - रोटी की तलाश में जो हैं उनकी खैर नहीं है...
प्रजा पूछती राजा का इतिहास खून से रँगा कहाँ...

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