सोमवार, 24 नवंबर 2014

आम कच्चे, दाँत खट्टे कर गए पर याद मीठी है...
बीस सालों बाद याद-ए-इश्क इक जलती अँगीठी है ...

वक्त के बेरहम पंजे की जकड़ है उम्र कैदी हो गए...
एक जैसी रेस है हर तरफ़ क्या बोरीवली है और वी. टी. है...

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