मंगलवार, 14 जून 2011


इम्तहान धीरज भरे, पतझर वाले पेड़
चैत चढ़ा बेसब्र है, कोयल कूके छेड़

गर्म हवा में पक रहे, फसल से लदे खेत
आँखों में पानी भरा, रिश्तों में है रेत

बौर टिकोरे बन गये, बाँटे हवा खटास
खलिहानों के बीच में, कहीं घड़ा भर प्यास

फिर कोंपल हैं नीम पर, आँगन ऊपर चाँद
जुगनू जुगनू रात भर, नगरी है आबाद




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