मठाधीश फागुन हुआ, अगुआ है रे भंग ।
रंग बहाना है बना , दो प्रेमी के संग ॥
सोलह की दहलीज पर, आँखों का तूफ़ान ।
सपनों में वो आ गया, खबर न कानोंकान ॥
होली है होली कहे, द्रुत में धिन धिन ढोल ।
सरा ररा रा सरा ररा, इस मौसम का बोल ।।
फ़्लैशबैक से दिख गये, बीते सारे साल ।
छुए हुए से गाल हैं, बिन गुलाल ही लाल ॥
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें