रविवार, 19 सितंबर 2010


बाढ़ बीता फिर बसेरे बन रहे हैं...
स्वप्न के अंकुर ध्वजा सा तन रहे हैं...

डूब जायें ये नहीं मंज़ूर आखिर...
तैरने से टूट हर बंधन रहे हैं...

सड़ गई अनुराग की डूबी फसल...
याद बन बदबू हवा में सन रहे हैं...

दबी चिनगारी मिली चूल्हा जला...
दुख नमक सा पानियों से छन रहे हैं...

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