शनिवार, 8 मई 2010


दर्द के हैं दिन इन्हें हँसकर जियेंगे ये ढलेंगे...
हाड़ गलने दो ज़रा उम्मीद के दीये जलेंगे...

रात की काली सुरंगों में सुबह सूरज मिलेंगे...
कामयाबी के सुनहले फूल अपने दम खिलेंगे...

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें