हल्दी में सने पाँव नीले आकाश पर छपते रहे...
पंछी थे ख्वाबों के आँखों में देखकर हँसते रहे...
धड़कन में सिहरन थी भाप भरी साँसें ज़ालिम...
वादों के झुरमुट थे उलझे से बाहों में कसते रहे...
थोड़े से अरमां थे उनपे भी लोगों के पहरे...
अपने थे रोको तो छुपकर पीछे से डँसते रहे....
सूख गये शीशम के पेड़ पर चिड़ियों ने डाले बसेरे...
उजड़े से चूल्हे में आग थी घर उससे बसते रहे...
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