शनिवार, 8 मई 2010





बीस बवंडर रोज़ रहेंगे, छोड़ो, आओ... सुबह-सुबह मिल बैठें, बतियायें...
पापड़,चिप्स उड़ायें ...
चाय की चुस्की...

हँसी-ठहाके बढ़ें, डाँट अम्मा की...
पायें, याद करें बीते पल, आयें...बरसें तो नावें तैरायें...
घाट हैं रिस्की...

चलो चलें कंपनी बाग, खोखा राय के ठंडे दही-बड़े बुलायें...
पिछ्ड़े हैं यार मैक्डोनाल्ड, फ़ूड बाज़ार, हमको नहीं भाये...

कटरा चलो ,नेतराम, लल्ला चुंगी, कहीं नहीं तो आओ, पानी में पाँव छपकायें...

बीपी हाई करो नहीं , रसूलाबाद घाट चलो संग में केले की नाव लिए, रेत में खेलें, घरौंदे बनायें, आर -पार तैरें-नहायें...
पुँछवट में ह्विस्की...

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